वाड्रफनगर। बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के वाड्रफनगर क्षेत्र के ग्राम रजखेता में आदिवासी भूमि से जुड़े विवाद में नया मोड़ सामने आया है। प्रार्थी पक्ष ने अपर कलेक्टर न्यायालय की कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि अंतिम आदेश के लिए 7 अक्टूबर 2026 की तारीख निर्धारित होने के बावजूद 29 सितंबर 2026 को ही प्रकरण में आदेश पारित कर उसे नस्तीबद्ध कर दिया गया। प्रार्थी ने तत्कालीन अपर कलेक्टर आर.एन. पाण्डेय पर निष्पक्ष सुनवाई का अवसर नहीं देने और कथित आर्थिक लेन-देन के जरिए निर्णय प्रभावित करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारी तथा अन्य आरोपित पक्षों का जवाब सामने आना बाकी है।
2017 के नक्शा सुधार आदेश से शुरू हुआ विवाद
मामले की शुरुआत तहसीलदार वाड्रफनगर के राजस्व प्रकरण क्रमांक 97/अ-6-अ/2016-17 से हुई थी। इस प्रकरण में 17 अक्टूबर 2017 को त्रुटि सुधार संबंधी आदेश पारित किया गया था। आरोप है कि आदिवासी रामसुन्दर पिता बोधन गोड़ के स्वामित्व वाली खसरा नंबर 1035, रकबा 0.28 हेक्टेयर की भूमि का नक्शा सुधार करते हुए उसे सामान्य वर्ग के रामस्वरूप पिता रामवृक्ष के नाम दर्ज कर दिया गया।
प्रभावित पक्ष को सूचना नहीं देने और सुनवाई का अवसर नहीं मिलने की शिकायत के बाद मामला अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) वाड्रफनगर के न्यायालय पहुंचा। एसडीओ न्यायालय ने 29 सितंबर 2025 को तहसीलदार के वर्ष 2017 के आदेश को निरस्त करते हुए राजस्व अभिलेखों को पूर्व स्थिति में बहाल करने का आदेश दिया था।
2.5 किलोमीटर दूर स्थित खसरों के नक्शा सुधार पर उठे सवाल
एसडीओ न्यायालय के आदेश के अनुसार, आदिवासी पक्ष की खसरा नंबर 1035 की भूमि और रामस्वरूप की खसरा नंबर 1273 की भूमि के बीच लगभग 2.5 किलोमीटर की दूरी थी। इसके बावजूद नक्शा सुधार की कार्यवाही किए जाने पर सवाल उठाए गए थे।
एसडीओ न्यायालय ने संबंधित प्रस्ताव और राजस्व अभिलेखों की प्रक्रिया पर आपत्तियां दर्ज करते हुए प्रभावित पक्ष को नोटिस नहीं दिए जाने तथा सुनवाई का अवसर नहीं मिलने के पहलू पर भी विचार किया था। आदेश में आदिवासी भूमि के रिकॉर्ड में बदलाव और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच की आवश्यकता का उल्लेख होने की बात कही गई है।
भूमि की बिक्री और राजस्व अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
प्रकरण में यह भी उल्लेख किया गया था कि कथित त्रुटि सुधार के बाद संबंधित भूमि सत्यानन्द पाण्डेय पिता सूर्यमंडी पाण्डेय तथा आकेत जायसवाल पिता अनिल जायसवाल के नाम बिक्री किए जाने की जानकारी न्यायालय के संज्ञान में आई थी।
इसी घटनाक्रम को लेकर एसडीओ न्यायालय ने राजस्व निरीक्षक की भूमिका की जांच और कथित कूटरचना के पहलू पर कार्रवाई की आवश्यकता जताई थी। हालांकि, भूमि के हस्तांतरण, संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और किसी कथित अनियमितता के संबंध में अंतिम निष्कर्ष सक्षम जांच एवं न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
अपर कलेक्टर न्यायालय में पहुंचा मामला
एसडीओ के 29 सितंबर 2025 के आदेश के विरुद्ध अपर कलेक्टर न्यायालय में अपील दायर की गई। प्रकरण क्रमांक 202509960100127 में 6 अक्टूबर 2025 को एसडीओ के आदेश के क्रियान्वयन पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिए जाने की जानकारी उपलब्ध कार्यवाही विवरण में दी गई है।
इसके बाद विभिन्न तारीखों पर पक्षकारों की उपस्थिति, दस्तावेज और तर्क प्रस्तुत किए गए। प्रार्थी पक्ष के अनुसार, 16 सितंबर 2026 को दोनों पक्षों के लिखित तर्क प्रस्तुत होने के बाद प्रकरण आदेशार्थ रखा गया था और अंतिम आदेश के लिए 7 अक्टूबर 2026 की तारीख निर्धारित थी।
29 सितंबर को ही आदेश पारित होने का आरोप
प्रार्थी पक्ष का मुख्य सवाल यह है कि जब प्रकरण अंतिम आदेश के लिए 7 अक्टूबर 2026 को नियत था, तो 29 सितंबर 2026 को ही आदेश पारित कर मामले को नस्तीबद्ध कैसे कर दिया गया। प्रार्थी का आरोप है कि उसे अपनी आपत्तियां प्रभावी ढंग से रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
प्रार्थी ने तत्कालीन अपर कलेक्टर आर.एन. पाण्डेय पर कथित आर्थिक लेन-देन के आधार पर निर्णय प्रभावित करने और सत्यानन्द पाण्डेय तथा आकेत जायसवाल के पक्ष में आदेश पारित करने का आरोप भी लगाया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यह स्पष्ट करने के लिए संबंधित न्यायालय का प्रमाणित आदेश, आदेश-पत्रिका और अन्य अभिलेखों का परीक्षण आवश्यक होगा कि आदेश वास्तव में किस तारीख को पारित हुआ और पक्षकारों को सुनवाई का कितना अवसर दिया गया।
अधिकारी के स्थानांतरण को लेकर भी सवाल
प्रार्थी पक्ष के अनुसार, मामले की कार्यवाही के दौरान संबंधित अधिकारी का स्थानांतरण भी हुआ था। प्रार्थी ने इस घटनाक्रम को देखते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उसका कहना है कि आदिवासी भूमि के राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव, उसके बाद हुए कथित हस्तांतरण और अपीलीय कार्यवाही के प्रत्येक चरण की जांच होनी चाहिए।
निष्पक्ष जांच की मांग
इस मामले में प्रमुख सवाल यह हैं कि क्या अपीलीय न्यायालय ने एसडीओ के आदेश में दर्ज टिप्पणियों और उपलब्ध राजस्व अभिलेखों का समुचित परीक्षण किया? क्या प्रार्थी को प्रभावी सुनवाई का अवसर मिला? निर्धारित तारीख से पहले आदेश पारित किए जाने के आरोप की वास्तविक स्थिति क्या है? और क्या कथित आर्थिक लेन-देन के आरोपों की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
प्रार्थी पक्ष ने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए जाने की मांग की है। फिलहाल, आरोपों की पुष्टि के लिए प्रमाणित न्यायालयीन अभिलेखों और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना आवश्यक है। मामले में आगे की जांच और कानूनी प्रक्रिया से ही आदिवासी भूमि विवाद तथा आदेश पारित किए जाने की परिस्थितियों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
