अंबिकापुर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को सौंपी गई जांच समिति की रिपोर्ट में स्वास्थ्य विभाग में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की कई परतें उजागर हुई हैं। रिपोर्ट में वर्ष 2019 से 2024 के बीच दवा और उपकरण खरीदी में गंभीर गड़बड़ियों का उल्लेख किया गया है।
जांच के दौरान जब समिति ने पुराने खरीदी रिकॉर्ड मांगे, तो संबंधित केंद्र द्वारा यह बताया गया कि कार्यालय में आग लगने से दस्तावेज नष्ट हो गए हैं। समिति ने इस दावे को संदेहास्पद मानते हुए इसे सबूत मिटाने की संभावित कोशिश बताया है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि दवा खरीदी के लिए निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया गया। प्रतिस्पर्धात्मक निविदा प्रक्रिया के बजाय एक ही फर्म को साठगांठ कर कई ऑर्डर जारी किए गए, जिनकी राशि 50-50 हजार रुपये तक बताई गई है। यह प्रक्रिया वित्तीय नियमों के विपरीत पाई गई।
वित्तीय वर्ष 2024-25 की फाइलों की जांच में यह भी पाया गया कि कई मामलों में दवाओं और उपकरणों की दर का उल्लेख किए बिना ही ऑर्डर जारी कर दिए गए। इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता माना गया है।
कीमोथेरेपी दवाओं की खरीदी में भी गड़बड़ी के आरोप सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित अधिकारियों द्वारा अनिवार्य स्वीकृति प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और दवाओं के इश्यू व उपयोग को लेकर संदेहास्पद एंट्री की गई।
इसके अलावा स्टॉक रजिस्टर में दर्ज दवाओं और वार्डों में वास्तविक उपलब्धता के बीच भारी अंतर पाया गया है, जिससे दवाओं के उपयोग और वितरण पर सवाल खड़े हो गए हैं।
जांच रिपोर्ट में तत्कालीन प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ. आयुष जायसवाल और डॉ. हिमांशु गुप्ता के कार्यकाल के दौरान हुई अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है। वहीं, स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि प्रभावशाली संबंधों के चलते मामले में निष्पक्ष कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
जांच समिति ने स्पष्ट किया है कि नियमों के विरुद्ध कार्य करना, लिपिकीय कर्मचारियों से स्टोर संचालन कराना और चयनित फर्मों को लाभ पहुंचाना गबन की श्रेणी में आता है।
फिलहाल, यह मामला प्रशासनिक कार्रवाई के इंतजार में है। अब देखना यह होगा कि संबंधित अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जाती है या मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।