- 14 गांवों के 1000 से अधिक आदिवासी बच्चों को स्थानीय माताओं द्वारा तैयार पौष्टिक भोजन।
- खेतों से सीधे स्कूल की रसोई तक ताजी सब्जियां और स्थानीय डेयरी से शुद्ध दूध।
- माताओं के हाथों से बने भोजन में पोषण के साथ प्यार और स्वच्छता भी शामिल।
- बच्चों की सेहत, उपस्थिति और आत्मविश्वास में उल्लेखनीय सुधार।
- सामाजिक भेदभाव की दीवार टूटी, सामूहिक भोजन से भाईचारे की भावना मजबूत।
सरगुजा (छत्तीसगढ़) – जिले के एक सुदूर ग्रामीण अंचल में महिलाओं ने मिलकर एक अनूठी पोषण क्रांति की शुरुआत की है। इस पहल ने बच्चों में कुपोषण को मात दी है और साथ ही स्थानीय स्तर पर रोजगार का नया अवसर भी पैदा किया है।
पहाड़ों और जंगलों से घिरे इस क्षेत्र में बच्चों में एनीमिया और कुपोषण की समस्या लंबे समय से बनी हुई थी। स्कूल प्रबंधन और ग्रामीण माताओं ने मिलकर समाधान खोजा और बच्चों की थाली में पौष्टिक भोजन पहुंचाने का संकल्प लिया।
माताओं का अनोखा मॉडल
- जैविक सब्जियां – माताओं द्वारा अपने खेतों में उगाई गई ताजी सब्जियां रोजाना स्कूल की रसोई तक पहुंचती हैं।
- शुद्ध दूध – महिला दुग्ध समितियों द्वारा बच्चों को फोर्टिफाइड मिल्क उपलब्ध कराया जाता है।
- माँ के हाथ का स्वाद – स्कूल की रसोई स्थानीय माताओं द्वारा संचालित है, जिससे भोजन में पोषण के साथ प्यार और सुरक्षा भी शामिल है।
पोषण मेन्यू
- ताजी हरी सब्जियां
- प्रोटीनयुक्त भोजन (दालें और अंकुरित अनाज)
- फोर्टिफाइड मिल्क
- ताजे मौसमी फल
- नियमित व्यायाम
प्रभाव और बदलाव
- बच्चों की सेहत में सुधार, वजन और स्टैमिना बढ़ा।
- स्कूल में उपस्थिति (Attendance) में उल्लेखनीय वृद्धि।
- सामाजिक भेदभाव खत्म, सामूहिक भोजन से भाईचारे की भावना मजबूत।
- बच्चों में आत्मविश्वास और सीखने की ललक बढ़ी।
स्थानीय आवाज़
महिला स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष अमिता सिंह ने कहा – "अब हमारे बच्चे थके-हारे नहीं दिखते। हमें गर्व है कि हमारे हाथ का बना पौष्टिक खाना खाकर बच्चे बड़े अफसर बनेंगे।"
प्रधानाचार्य ने बताया – "एक माँ से बेहतर बच्चों की सेहत का ध्यान कोई नहीं रख सकता। अब बच्चे सुबह स्कूल आने के लिए खुद जिद करते हैं।"
📍 सरगुजा का यह मॉडल देश के ग्रामीण इलाकों के लिए एक अनुकरणीय मिसाल है, जो साबित करता है कि मातृ शक्ति और स्थानीय संसाधनों के सहयोग से कुपोषण जैसी चुनौती को आसानी से खत्म किया जा सकता है।