अंबिकापुर। सरगुजा जिले में किसानों की मिट्टी जांच योजना के क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। कई किसानों का आरोप है कि उनके खेतों से मिट्टी का नमूना लिए बिना ही उनके नाम पर मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) जारी कर दिए गए। इससे किसानों को अपने खेत की वास्तविक उर्वरता और पोषक तत्वों की जानकारी नहीं मिल पा रही है, जबकि इस योजना पर हर वर्ष लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं।
स्थानीय स्तर पर कई किसानों से बातचीत में सामने आया कि पिछले कई वर्षों से उनके खेतों से मिट्टी का नमूना लेने कोई अधिकारी या कर्मचारी नहीं पहुंचा, लेकिन विभागीय रिकॉर्ड में उनके नाम से जांच पूरी दिखाकर मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी कर दिया गया। किसानों का कहना है कि जब नमूना ही नहीं लिया गया तो रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की गई, यह जांच का विषय है।
जानकारों के अनुसार मृदा स्वास्थ्य कार्ड का उद्देश्य किसानों को यह जानकारी देना है कि उनके खेत में कौन-कौन से पोषक तत्वों की कमी है तथा किस प्रकार और कितनी मात्रा में उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए। यदि रिपोर्ट वास्तविक जांच के बिना तैयार की जाती है तो किसान अनुमान के आधार पर खाद का उपयोग करते हैं, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ उत्पादन भी घट सकता है।
बताया जाता है कि जिले में पिछले वर्ष राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत लगभग 12 हजार किसानों के खेतों की मिट्टी जांच का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। योजना पर लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि वास्तविक नमूना संग्रहण नहीं हुआ तो सरकारी राशि के उपयोग और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
कई गांवों के किसानों ने जताई आपत्ति
अंबिकापुर एवं लखनपुर विकासखंड के विभिन्न गांवों के किसानों ने दावा किया कि उनके खेतों से वर्षों से मिट्टी का नमूना नहीं लिया गया। कुछ किसानों ने बताया कि उन्हें यह भी जानकारी नहीं थी कि उनके नाम से मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी हो चुका है। कई मामलों में पुराने नमूनों के आधार पर नई रिपोर्ट जारी होने की भी शिकायत सामने आई है।
वैज्ञानिकों ने जताई चिंता
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेत की मिट्टी की समय-समय पर वैज्ञानिक जांच आवश्यक होती है। सही रिपोर्ट के आधार पर ही उर्वरकों का संतुलित उपयोग संभव है। यदि जांच प्रक्रिया में लापरवाही होती है तो मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों और आवश्यक पोषक तत्वों की कमी बढ़ सकती है, जिससे लंबे समय में भूमि की उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा रहता है।
निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी का नमूना खेत के अलग-अलग स्थानों से निर्धारित गहराई (लगभग 3 से 6 इंच) तक लेकर वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया जाता है। इसके बाद प्रयोगशाला में जांच कर रिपोर्ट बनाई जाती है। यदि यह प्रक्रिया अपनाए बिना रिपोर्ट तैयार की जाती है तो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
किसानों की मांग
किसानों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, वास्तविक नमूना संग्रहण सुनिश्चित करने तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड तभी उपयोगी होगा जब वह वास्तविक जांच पर आधारित हो।
