कलेक्ट्रेट के बाबू के घर 2013 में पड़ा था ACB का छापा; करीब एक किलो सोना, नकदी और कई संपत्तियां मिली थीं...
अंबिकापुर। कलेक्ट्रेट में कभी भू-अभिलेख शाखा के क्लर्क रहे ऋषि कुमार सिंह की 13 साल पुरानी आय से अधिक संपत्ति की जांच आखिरकार अदालत के फैसले तक पहुंच गई। विशेष न्यायालय ने बेहिसाब संपत्ति के मामले में उन्हें चार साल के कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने जब्त करीब 950 ग्राम सोने के जेवर, चांदी के आभूषण और नकदी को राजसात करने का आदेश भी दिया है।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जांच में ऋषि कुमार सिंह और उनके परिवार के नाम करीब 4.49 करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति सामने आई, जबकि जांच एजेंसी ने इसे उनकी ज्ञात आय की तुलना में 1049 गुना अधिक बताया था। 2013 में कार्रवाई के समय सामने आई संपत्ति को लेकर उस दौर में भी यह मामला अंबिकापुर में काफी चर्चित रहा था। तत्कालीन मीडिया रिपोर्टों में संपत्ति का प्रारंभिक आकलन करीब छह करोड़ रुपए तक बताया गया था।
छापे में नकदी से लेकर सोना-चांदी तक
ACB ने जून 2013 में केदारपुर स्थित ऋषि कुमार सिंह के मकान पर छापा मारा था। तलाशी में करीब 14 लाख रुपए नकद, सोने-चांदी के आभूषण और अन्य दस्तावेज मिले थे। पुराने समाचारों के अनुसार उस समय परिवार के नाम बैंक जमा और करीब 70 तोला सोने के जेवर की जानकारी भी सामने आई थी।
जांच आगे बढ़ी तो संपत्तियों का दायरा घर तक सीमित नहीं रहा। जांच में उनके नाम केदारपुर में दो मंजिला मकान, बेटे सचिन कुमार सिंह के नाम डिगमा में फार्म हाउस, बेटी रश्मि सिंह के नाम सुभाषनगर और भगवानपुर में फार्म हाउस, निर्माणाधीन मैरिज हॉल तथा कुंडला सिटी में संपत्ति का उल्लेख सामने आया। पत्नी सुनयना सिंह के नाम दत्ता कॉलोनी, नमनाकला में मकान भी जांच के दायरे में आया।
लॉकर खोला तो निकले 950 ग्राम सोने के जेवर
ACB की कार्रवाई में बैंक लॉकर से 82,500 रुपए नकद, 950.09 ग्राम सोने के जेवर और 856 ग्राम चांदी के आभूषण मिलने का उल्लेख है। इनकी कीमत करीब 25.47 लाख रुपए आंकी गई थी।
यानी एक सरकारी क्लर्क की नौकरी से जुड़ी जांच में सवाल सिर्फ बैंक बैलेंस या घर में रखी नकदी का नहीं था, बल्कि संपत्ति के ऐसे बड़े नेटवर्क का था जिसका संतोषजनक स्रोत जांच और मुकदमे के दौरान नहीं बताया जा सका।
1984 में अनुकंपा नियुक्ति, 2013 तक करोड़ों की संपत्ति
ऋषि कुमार सिंह की जुलाई 1984 में राजस्व विभाग में सहायक ग्रेड-3 के पद पर अनुकंपा नियुक्ति हुई थी। जांच में 5 जुलाई 1984 से 19 जून 2013 के बीच उनके और परिवार के नाम करीब 4 करोड़ 49 लाख 46 हजार 736 रुपए की चल-अचल संपत्ति होने का उल्लेख किया गया।
ACB ने 18 जून 2013 को FIR दर्ज की और अगले दिन केदारपुर स्थित मकान में कार्रवाई की। बाद में वर्ष 2018 में विशेष न्यायालय में अभियोग पत्र पेश किया गया।
सबसे बड़ा सवाल—इतनी संपत्ति आई कहां से?
पूरे मामले का सबसे अहम बिंदु यही था। अभियोजन के मुताबिक आय और संपत्ति के बीच भारी अंतर था। सुनवाई के दौरान ऋषि कुमार सिंह अपनी संपत्ति के स्रोत को लेकर अदालत को संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। इसी आधार पर अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए चार साल की सजा सुनाई।
सरकारी नौकरी में रहते हुए संपत्ति अर्जित करना अपने आप में अपराध नहीं है, लेकिन जब संपत्ति ज्ञात आय से असंगत हो और उसके वैध स्रोत का संतोषजनक हिसाब न दिया जा सके, तो वही संपत्ति जांच एजेंसियों और अदालत के लिए गंभीर सवाल बन जाती है।
2013 में छापा, 2018 में चालान और अब सजा
इस मामले की कहानी भी सरकारी भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की तरह लंबी रही। 2013 में छापा, उसके बाद जांच, 2018 में अभियोग पत्र और अब फैसला। इस दौरान आरोपी कर्मचारी सेवा से सेवानिवृत्त भी हो गया।
ऋषि कुमार सिंह का नाम वर्ष 2011 में कलेक्ट्रेट में बंगाली जमीनों की बिक्री की अनुमति से जुड़े विवादों को लेकर भी चर्चा में आया था। बाद में उन्हें एक मामले में निलंबित किए जाने की बात सामने आई थी।
13 साल बाद आया फैसला, लेकिन सवाल आज भी वही
इस फैसले ने एक बार फिर उस पुराने सवाल को सामने ला दिया है कि सरकारी सेवा के दौरान आय से कई गुना अधिक संपत्ति जुटाने के मामलों में कार्रवाई इतनी लंबी क्यों चलती है? 2013 में जिस संपत्ति को लेकर ACB ने छापा मारा था, उस मामले में अदालत का अंतिम फैसला आने में करीब 13 साल लग गए।
अदालत की सजा के बाद अब मामला सिर्फ एक रिटायर्ड क्लर्क की संपत्ति का नहीं रह गया है। यह उन तमाम मामलों के लिए भी सवाल है जहां सरकारी कर्मचारी की घोषित आय और वास्तविक संपत्ति के बीच बड़ा अंतर सामने आता है—जांच समय पर पूरी हो, मुकदमा तेजी से चले और दोष सिद्ध होने पर संपत्ति की वसूली भी प्रभावी ढंग से हो, तभी भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का वास्तविक असर दिखाई देगा।




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