- कथित भाजपा कार्यकर्ता पर कार्यालय संभागीय सेनानी नगर सेना की भूमि कब्जाने का आरोप
- तत्कालिक नगर सेना अधिकारी से साठगांठ कर इनके द्वारा पर किराए के मकान निर्माण और किराया वसूली की चर्चा
- कलेक्टर बंगले से कुछ ही दूरी पर अतिक्रमण का दावा, किराए के मकान बनाकर वर्षों से वसूला जा रहा किराया, शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने से उठे सवाल
- डीसी रोड स्थित नगर सेना कार्यालय की भूमि पर अवैध कब्जे का आरोप
- 10 से 15 डिसमिल जमीन पर किराए के मकान निर्माण और किराया वसूली की चर्चा
- कलेक्टर बंगले से मात्र 200 मीटर दूर विवादित भूमि
- शिकायतों के बावजूद कार्रवाई न होने से उठे प्रशासनिक सवाल
- सीमांकन और निष्पक्ष जांच की मांग
अंबिकापुर। सरगुजा मुख्यालय अंबिकापुर के डीसी रोड क्षेत्र में स्थित कार्यालय संभागीय सेनानी नगर सेना की भूमि पर कथित कब्जे का मामला अब चर्चा का विषय बनता जा रहा है। कार्यालय संभागीय सेनानी नगर सेना जमीन पर अवैध कब्जा कर किराए के मकान निर्माण और किराया वसूली किए जाने के आरोपों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि जिस भूमि को लेकर विवाद सामने आया है, वह जिला प्रशासन के सबसे संवेदनशील क्षेत्र माने जाने वाले कलेक्टर बंगले से कुछ ही दूरी पर स्थित है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजनीतिक प्रभाव और संरक्षण के दम पर वर्षों से जमीन पर कब्जा कायम रखा गया है। कई बार शिकायतें होने के बावजूद अब तक न तो सीमांकन की प्रक्रिया पूरी हो सकी है और न ही कब्जे के आरोपों की निष्पक्ष जांच सामने आ सकी है। इससे लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि प्रभावशाली व्यक्तियों के मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई की रफ्तार सामान्य मामलों की तुलना में काफी धीमी हो जाती है।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार डीसी रोड क्षेत्र में स्थित भूमि का खसरा क्रमांक 1911/36 बताया जा रहा है। राजस्व अभिलेखों के अनुसार इस भूमि का कुल रकबा लगभग 50 डेसिमल है, जो कार्यालय संभागीय सेनानी नगर सेना से संबंधित बताई जा रही है।
आरोप है कि उक्त भूमि के लगभग 10 से 15 डेसिमल हिस्से पर वर्षों पहले कब्जा कर लिया गया और धीरे-धीरे वहां किराए के मकान तैयार कर दिए गए। वर्तमान में इन मकानों से किराया वसूले जाने की बात भी सामने आ रही है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि यह भूमि वास्तव में कार्यालय संभागीय सेनानी नगर सेना नाम दर्ज है, तो उस पर निजी निर्माण और किराया वसूली गंभीर विषय है जिसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।
कलेक्टर बंगले से 200 मीटर दूर कैसे चलता रहा कब्जे का खेल?
मामले का सबसे चर्चित पहलू यह है कि विवादित भूमि शहर के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासनिक क्षेत्र में स्थित है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह जमीन कलेक्टर बंगले से लगभग 200 मीटर की दूरी पर है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि वास्तव में वर्षों से अतिक्रमण और निर्माण कार्य होते रहे, तो संबंधित विभागों की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी? नगर निगम, राजस्व विभाग, तहसील कार्यालय और अन्य प्रशासनिक इकाइयों की नियमित निगरानी व्यवस्था के बावजूद यदि ऐसी स्थिति बनी रही, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
शिकायतें हुईं, लेकिन कार्रवाई क्यों नहीं?
सूत्रों के अनुसार मामले की जानकारी कई बार संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई गई। कार्यालय संभागीय सेनानी नगर सेना से जुड़े लोगों द्वारा भी शिकायत किए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि शिकायतों के बाद क्या कार्रवाई हुई, इसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं हो सकी है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तियों से जुड़े मामलों में जांच और कार्रवाई अक्सर लंबी खिंच जाती है। यही कारण है कि वर्षों बाद भी विवाद जस का तस बना हुआ है।
सीमांकन ही बताएगा सच्चाई
राजस्व मामलों के जानकारों का कहना है कि इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भूमि का सीमांकन है। जब तक राजस्व विभाग द्वारा अधिकृत सीमांकन नहीं कराया जाएगा, तब तक वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाएगी।
सीमांकन के बाद यह पता चल सकेगा कि—
- भूमि की वास्तविक सीमा क्या है?
- कब्जे का आरोपित क्षेत्र कितना है?
- निर्माण किस हिस्से में किया गया है?
- संबंधित भूमि का वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड क्या कहता है?
- किसी प्रकार की लीज, अनुमति या वैधानिक स्वीकृति मौजूद है या नहीं?
विशेषज्ञों का मानना है कि विवाद का स्थायी समाधान केवल दस्तावेजी जांच और सीमांकन से ही संभव है।
दूसरी जमीनों को लेकर भी उठे आरोप
मामले में यह आरोप भी सामने आया है कि कथित कब्जाधारी द्वारा क्षेत्र की अन्य निजी भूमि पर भी हस्तक्षेप या कब्जे का प्रयास किया गया। विशेष रूप से हनुमान सिंह की पत्नी उर्मिला देवी की वसीयत की जमीन के कुछ हिस्से को लेकर विवाद की चर्चा स्थानीय स्तर पर हो रही है। हालांकि हनुमान सिंह के द्वारा तीन बार थाना कोतवाली अंबिकापुर में शिकायत की जा चुकी है, जिसमें थाना प्रभारी द्वारा तीन बार फेना काट कर दिया गया है, जिसके आधार पर सिविल कोर्ट द्वारा तत्काल स्टे दिया गया है। फिर भी लगातार सामने आ रहे आरोपों ने विवाद को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
जनता पूछ रही—क्या प्रभावशाली लोगों पर भी होगी कार्रवाई?
अंबिकापुर शहर में इस मामले को लेकर विभिन्न तरह की चर्चाएं हो रही हैं। आम नागरिकों का कहना है कि यदि किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा सरकारी, संस्थागत या निजी भूमि पर कब्जा किया जाता है तो उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई होती है। ऐसे में यदि प्रभावशाली व्यक्तियों पर आरोप लग रहे हैं तो जांच और कार्रवाई भी समान रूप से होनी चाहिए। लोगों का मानना है कि कानून का शासन तभी प्रभावी माना जाएगा जब कार्रवाई व्यक्ति की राजनीतिक पहचान नहीं बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की जाए।
प्रशासन से क्या है अपेक्षा?
स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और संभागीय सेनानी संगठन से जुड़े लोगों ने मांग की है कि—
- विवादित भूमि का तत्काल सीमांकन कराया जाए।
- राजस्व अभिलेख सार्वजनिक किए जाएं।
- कब्जे के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो।
- यदि अवैध निर्माण पाया जाए तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
- संस्था की संपत्ति को अतिक्रमण से मुक्त कराया जाए।
- जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर लोगों के सामने तथ्य रखे जाएं।
प्रशासनिक जांच के बाद ही स्पष्ट होगी सच्चाई
फिलहाल पूरे मामले में कई गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, लेकिन अंतिम निष्कर्ष केवल प्रशासनिक जांच, सीमांकन और राजस्व अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही सामने आएगा। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस मामले को किस प्राथमिकता से लेते हुए जांच आगे बढ़ाता है और क्या स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़ी संस्था की भूमि पर कब्जे के आरोपों की सच्चाई जनता के सामने आ पाती है या नहीं।
