- अस्पताल के प्रचार और वास्तविक सुविधाओं में बड़ा अंतर
- विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियमित उपलब्धता पर संदेह
- नर्सिंग होम एक्ट के नियमों का पालन न करने के आरोप
- आईसीयू, वार्ड और फायर सेफ्टी व्यवस्था पर सवाल
- मीडिया से दूरी बनाकर कर्मचारियों को आगे करने का आरोप
- शिकायत सीएमएचओ कार्यालय तक पहुंचने की चर्चा
- हॉस्पिटल का संचालक मीडिया से बचता है, कर्मचारियों को करता है आगे
अम्बिकापुर। हम बड़े निजी अस्पतालों में इसलिए जाते हैं क्योंकि वहां विशेषज्ञ डॉक्टर, आधुनिक मशीनें और बेहतर इलाज की उम्मीद होती है। मरीज और उनके परिजन अधिक फीस भी इसी भरोसे पर देते हैं कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा मिलेगी। लेकिन यदि किसी अस्पताल में बाहर बड़े-बड़े दावे किए जाएं और अंदर हकीकत कुछ और निकले, तो यह सीधे तौर पर मरीजों के भरोसे के साथ खिलवाड़ है।अब ऐसा ही मामला सामने आ रहा है अम्बिकापुर के लक्ष्मी नारायण हॉस्पिटल का, जिसके संचालक डॉ. प्रतीक खरे बताए जा रहे हैं। अस्पताल अपने आपको अत्याधुनिक सुविधाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों से सुसज्जित बताता है, लेकिन पड़ताल में कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
क्या है पूरा मामला-
अस्पताल के बाहर बड़े-बड़े फ्लेक्स और प्रचार सामग्री में विभिन्न बीमारियों के इलाज, आधुनिक मशीनों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की लंबी सूची दिखाई जाती है। मरीजों को ऐसा महसूस कराया जाता है कि यहां हर बीमारी का इलाज उपलब्ध है और हर क्षेत्र के डॉक्टर मौजूद हैं।मरीजों को दिए जाने वाले फोल्डर और दस्तावेजों में कई नामी डॉक्टरों के नाम लिखे गए हैं, लेकिन अस्पताल पहुंचने वाले कई लोगों का आरोप है कि उन डॉक्टरों की नियमित उपस्थिति का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं होता। कौन डॉक्टर कब बैठता है, किस समय ओपीडी होती है, इसकी जानकारी अस्पताल परिसर में स्पष्ट रूप से प्रदर्शित नहीं की गई है।सत्रों की मानें तो कई डॉक्टर केवल “ऑन कॉल” बताए जाते हैं, जबकि प्रचार इस प्रकार किया जाता है मानो सभी विशेषज्ञ हमेशा अस्पताल में उपलब्ध हों। यह स्थिति नर्सिंग होम एक्ट के तहत भ्रामक प्रचार की श्रेणी में आ सकती है।
नर्सिंग होम एक्ट के नियम क्या कहते हैं-
नर्सिंग होम एक्ट के तहत अस्पतालों को कई अनिवार्य नियमों का पालन करना होता है, जिनमें प्रमुख हैं—
- अस्पताल में कितने बेड हैं, इसकी स्पष्ट जानकारी बाहर लिखी होना चाहिए।
- पंजीयन प्रमाण पत्र की प्रति रिसेप्शन के पास प्रदर्शित होना चाहिए।
- डॉक्टरों की ड्यूटी, समय और उपलब्धता स्पष्ट रूप से लिखी जानी चाहिए।
- आयुष्मान योजना के तहत कौन-कौन सी बीमारियों का इलाज उपलब्ध है और कितनी राशि स्वीकृत होती है, इसकी जानकारी प्रदर्शित होनी चाहिए।
मरीज या परिजनों द्वारा मांगे जाने पर अस्पताल से संबंधित आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य होता है।लेकिन आरोप है कि इन नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा।
इंफ्रास्ट्रक्चर और मूलभूत सुविधाओं पर सवाल-
लक्ष्मी नारायण हॉस्पिटल अपने आपको आधुनिक सुविधाओं से लैस बताता है, लेकिन अस्पताल की मूलभूत व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार आईसीयू, जनरल वार्ड, टॉयलेट और बाथरूम जैसी आवश्यक सुविधाएं मानकों के अनुरूप नहीं हैं।बताया जा रहा है कि अस्पताल का संचालन कई हिस्सों में किया जा रहा है—ओपीडी अलग, जांच व्यवस्था अलग और भर्ती वार्ड अलग संचालित हैं। यह भी चर्चा है कि संबंधित विभाग से सभी हिस्सों की विधिवत अनुमति ली गई है या नहीं, इस पर भी सवाल हैं।
फायर सेफ्टी व्यवस्था पर भी उठे सवाल-
गर्मी के मौसम में लगातार आगजनी की घटनाएं सामने आ रही हैं। ऐसे में अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थानों में फायर सेफ्टी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।लेकिन अस्पताल में पर्याप्त अग्निशमन उपकरण, आपातकालीन निकासी द्वार और सुरक्षा मानकों की स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यदि कभी बड़ा हादसा हो जाए तो मरीजों और परिजनों की सुरक्षा कैसे होगी, यह चिंता का विषय है।
मीडिया से दूरी, कर्मचारियों को आगे करने का आरोप-
जब मीडिया टीम द्वारा अस्पताल प्रबंधन से पक्ष जानने की कोशिश की गई तो संचालक डॉ. प्रतीक खरे सामने नहीं आए। आरोप है कि उन्होंने सीधे जवाब देने के बजाय कर्मचारियों को आगे कर दिया।मीडिया द्वारा अस्पताल के बाहर सड़क से रिपोर्टिंग किए जाने पर भी कुछ कर्मचारियों द्वारा आपत्ति जताई गई और कवरेज में व्यवधान उत्पन्न करने की कोशिश की गई। सवाल यह उठता है कि यदि अस्पताल प्रबंधन पूरी तरह नियमों के अनुरूप काम कर रहा है, तो मीडिया से बचने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।
पहले भी उठ चुके हैं गंभीर सवाल-
स्थानीय लोगों के अनुसार इससे पहले भी इलाज में लापरवाही और मरीजों को समय पर रेफर न किए जाने जैसे आरोप सामने आते रहे हैं। हालांकि इन मामलों में आधिकारिक जांच और कार्रवाई क्या हुई, यह स्पष्ट नहीं हो सका है।
सीएमएचओ से शिकायत-
मामले की गंभीरता को देखते हुए शिकायत संबंधित स्वास्थ्य विभाग और सीएमएचओ कार्यालय तक पहुंचने की चर्चा है। अब देखने वाली बात होगी कि जांच निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से होती है या नहीं।
क्या चाहता है मीडिया-
सरकारी अस्पतालों में सीमित संसाधनों के कारण लोग निजी अस्पतालों की ओर जाते हैं ताकि उन्हें बेहतर इलाज मिल सके। लेकिन यदि निजी अस्पताल प्रचार और वास्तविक सुविधा में बड़ा अंतर रखें, तो यह मरीजों के साथ अन्याय है।जो डॉक्टर लिखे गए हैं वे उपलब्ध हों, जो सुविधाएं दिखाई जा रही हैं वे वास्तव में मौजूद हों और मरीजों को पारदर्शी जानकारी मिले—बस यही अपेक्षा हर जिम्मेदार समाज और मीडिया की है।
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