भाजपा अजजा मोर्चा और पंडो समाज ने किया टी.एस. बाबा का पुतला दहन, भूमि विवाद पर आक्रोश

भाजपा अजजा मोर्चा और पंडो समाज ने किया टी.एस. बाबा का पुतला दहन, भूमि विवाद पर आक्रोश


  1. कुन्नी के नवापारा चौक पर भाजपा अजजा मोर्चा और पंडो समाज का विरोध प्रदर्शन
  2. टी.एस. बाबा के बयान से आहत होकर पुतले पर जूता-चप्पल फेंककर किया दहन
  3. पंडो भूमि विवाद पर भाजपा जिलाध्यक्ष की पहल, समाज में बढ़ा असंतोष
  4. जिलाध्यक्ष बिंदेश्वरी पैकरा ने कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाया
  5. विरोध प्रदर्शन में भाजपा पदाधिकारी और पंडो समाज के लोग रहे शामिल

⚠️ विरोध प्रदर्शन का घटनाक्रम

अंबिकापुर, 10 मार्च 2026 – लखनपुर क्षेत्र के कुन्नी नवापारा चौक पर भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा और पंडो समाज ने पूर्व उप मुख्यमंत्री टी.एस. बाबा का पुतला दहन किया।

  • प्रदर्शनकारियों ने बाबा के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
  • पंडो समाज के लोग तीर-धनुष और फरसा लेकर पहुंचे और पुतले पर जूता-चप्पल फेंकते हुए उसे आग के हवाले कर दिया।


📑 विवाद की पृष्ठभूमि

राजाकटेल गांव में विशेष पिछड़ी जनजाति पंडो की जमीनों पर एक विशेष समुदाय द्वारा कब्जे का मामला सामने आया था।
भाजपा जिलाध्यक्ष भारत सिंह सिसोदिया ने पंडो समाज को उनका अधिकार दिलाने की पहल की थी।
इसी बीच टी.एस. बाबा के बयान कि “वे गौचर भूमि में काबिज हैं” से समाज में भारी असंतोष फैल गया।


👥 भाजपा नेताओं के आरोप

भाजपा अजजा मोर्चा जिलाध्यक्ष बिंदेश्वरी लाल पैकरा ने कहा कि टी.एस. बाबा तुष्टिकरण की राजनीति कर रहे हैं और पंडो समाज के दर्द को राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस आदिवासी समाज का उपयोग केवल वोट बैंक के लिए करती है और उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेती।
पैकरा ने कहा कि बाबा की एक पक्षीय बात आदिवासी समाज को आहत करती है और यह कांग्रेस की आदिवासी विरोधी मानसिकता को दर्शाती है।



👥 उपस्थित पदाधिकारी और समाजजन

विरोध प्रदर्शन में भाजपा जिला उपाध्यक्ष इंदर भगत, मंडल अध्यक्ष रविशंकर, मोर्चा जिला महामंत्री रविकांत उराँव एवं कमलेश टोपो, मोर्चा मंडल अध्यक्ष सुख साय पोर्ते, डॉ. शिवमंगल सिंह सहित भाजपा कार्यकर्ता, पदाधिकारी और पंडो समाज के पुरुष-महिला बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।



📍 कुन्नी नवापारा चौक पर हुआ यह विरोध प्रदर्शन पंडो समाज के आक्रोश और भाजपा अजजा मोर्चा की सक्रियता को दर्शाता है। भूमि विवाद और राजनीतिक बयानबाजी ने आदिवासी समाज में असंतोष की स्थिति को और गहरा कर दिया है।

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